Wednesday, 1 May 2013

औरत को गढ़ना पड़ता है ....



औरतें  होती है 
नदिया सी 
 तरल पदार्थ की तरह 
जन्म से ही 
हर सांचे में रम
 जाती है ...

और पुरुष होते है  
पत्थर से 
 ठोस पदार्थ की तरह ,
औरत को  गढ़ना पड़ता है 

छेनी- हथौड़ा ले कर
इनको 
 अपने सांचे के अनुरूप ...

 एक अनगढ़ को 
गढने  की नाकाम 
कोशिशों में ,
ये औरतें सारी उम्र
लहुलुहान करती रहती 
अपनी उँगलियाँ और 
कभी अपनी आत्मा भी ...