Monday, 29 April 2013

पर तुम एक आभास ही तो हो ...


तुमको याद करना

 तुमको ढूँढना ,

हर आहट पर पलट

 कर देखना के तुम

 आ रहे हो शायद ...


पर तुम ,तुम 

तो हो ही नहीं

 एक आभास 

ही तो हो ...


मुझे यूँ भी लगता है
 ,
एक दिन तुम आओगे

 और मेरे कंधे पर धीरे 

 हाथ रखोगे

 मैं पलट कर देखूंगी ,

तुम्हे अपने सामने

 ही पाऊँगी...


मैं इसी आभास 

मैं ही रहती हूँ

 और गुम रहना भी

 चाहती हूँ ...

( चित्र गूगल से साभार )

28 comments:

  1. उम्मीद जगाये रखियेगा
    जरुर एक दिन वो आयेगा
    आमीन !

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    1. हार्दिक आभार विभा जी

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  2. हृदयस्पर्शी..

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    1. हार्दिक आभार अमृता जी

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  3. मैं इसी आभास में रहती हूँ .........बहुत अच्छा !
    डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest postजीवन संध्या
    latest post परम्परा

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    1. हार्दिक आभार कालिपद जी

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  4. बहुत ही सुन्दर एहसास जिसमे हम जी लेते हैं

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    1. हार्दिक आभार रमाकांत सिंह जी

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार के "रेवडियाँ ले लो रेवडियाँ" (चर्चा मंच-1230) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. हार्दिक आभार रूप चन्द्र शास्त्री जी

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  6. बहुत सुन्दर अहसास..

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    1. हार्दिक आभार महेश्वरी कनेरी जी

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  7. बहुत बेहतरीन सुंदर प्रस्तुति ,,,

    RECENT POST: मधुशाला,

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    1. हार्दिक आभार धीरेन्द्र जी

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  8. बहुत सुन्दर |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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    1. हार्दिक आभार तुषार राज जी

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  9. भावनाओं कि खूबसूरत अभिव्यक्ति! बधाइयाँ इस रचना के लिए!

    -Abhijit (Reflections)

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    1. हार्दिक आभार अभिजित जी

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  10. बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना.

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    1. हार्दिक आभार राजेन्द्र जी

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  11. हृदयस्पर्शी रचना..

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    1. हार्दिक आभार साकेत जी

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  12. खूबसूरत अभिव्यक्ति उपासना जी

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    1. हार्दिक आभार अरुणा जी

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  13. एक अनाम इंतजार का प्रकटण। बार-बार आहटों से लगना की वह आया है पर असल में नहीं आना इंतजार करने वाले के आंखों में दुःख बढा देता है।

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    1. हार्दिक आभार विजय जी

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  14. सुंदर अभिव्यक्ति .....

    आभास की अवस्था हमेशा एहसास के साथ ही होती है, जबकि सामने सच के होने पर हो सकता है एहसास जैसा भाव न हो .......
    इसलिए आभास (Subjectivity), तथ्य/सत्य (Objectivity) से ऊपर ही है ......और ये पंक्ति कि "मैं इसी आभास मे ही रहती हूँ ...... " एक बेहतर अवस्था कही जा सकती है ......

    आपकी कल्पना क्षमता की तारीफ करनी पड़ेगी !

    शुभकामनायें !

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    1. कुछ समझ आया कुछ नहीं आया लेकिन फिर भी आपकी बात अच्छी लगी ..अमुल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार जी

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