Friday, 12 April 2013

मैं अक्सर तुम्हारी तस्वीर में अपने रंग खोजती हूँ ...


दो कजरारी आंखे
 झपकते हुए ,
मैं अक्सर 
तुम्हारी तस्वीर में
अपने रंग  खोजती हूँ ...
वे रंग 
जो  कभी मैंने 
तुम्हें दिए थे ,
उनका क्या हुआ ...!
सागर की सी 
गहराई लिए दो आँखे ,
एक टक देखते हुए ...
हाँ वो रंग,
 अभी भी मेरे पास है और 
बहुत प्रिय भी ...
 पर 
वे  रंग चाह कर भी मैं ,
मेरे जीवन के केनवास 
पर नहीं उतार पाता...
उन रंगों को
 मैंने 
नज़रों में बसा कर 
 रखा है ...
जब भी आइना
 देखता हूँ 
तुम्हारा अक्स ढूंढ़ता  हूँ ...
कजरारी आँखें 
बरस पड़ी ,
सागर सी गहराई वाली 
आँखों की गहराई
 कुछ और गहरी हो गयी ....