Monday, 8 April 2013

वैसे तुम कहाँ हो अब ...


तुमने कहा
जैसे मैं तुम्हे देखती हूँ
तुम वैसे ही हो ...

लेकिन
जैसे मैं देखती हूँ
वैसे तुम कहाँ हो अब ...

समय बदल जाता है
मौसम बदल जाते है
दिन भी तो
एक जैसे कहाँ रहते हैं ...

एक दिन में भी तो कई
प्रहर होते हैं
हर प्रहर का भी तो
मौसम होता है
तासीर होती है ...

फिर तुम वैसे ही कैसे
रह सकते हो
जैसा मैं देखना चाहती हूँ ...

मौसम की तरह तुम भी
 बदले हो
नज़र ना बदली हो चाहे
नजरिया बदल कर
नज़रें तो फेर  ही ली तुमने ....

समय का फेर ही कहोगे तुम
इसे
मैं कहूँगी तुम्हारे मन का फेर ,
लेकिन इसे ...

फिर तुम कैसे कह सकते हो
जैसे मैं देखती हूँ
तुम वैसे ही हो ...