Wednesday, 3 April 2013

सरिता का हठ ...!




सागर का  खारापन 
सरिता का घुलता अस्तित्व,
हारी सरिता 
हठ  पर उतर आयी .......

सागर का अनुनय 
गर घुलती रही 
सरिता उसमे ,
सानिंध्य उसका 
सागर को भी मीठा कर देगा 
 सरिता की मिठास से
छोड़ देगा अपना खारापन ..

सरिता का हठ ...!

अपनी पहचान बनाने का 
धरा की कठोरता 
गगन की तपिश ना 
रोक पाएगी उसे ....

सागर की फैली बाहों को
 कर अनदेखा 
बस चली,इठलाती
अपनी नयी डगर पर .......

 सागर के बिन सरिता का
 अस्तित्व भी क्या ...!

जरा सी तपिश ना  सहन हुई
कुम्हलाई , 
मुरझाई सरिता ...

मुड़ कर देखा जो 
एक बार फिर से 
सागर भीगी आँखे लिए 
बाहें फैलाये 
प्रतीक्षा में था उसकी 
अभी भी ...

सरिता फिर से मुड़ चली
सागर से मिलने ..........