Thursday, 25 April 2013

तो ये मन कब्रिस्तान ही बन जाता है ...

जब कोई सुनने वाला न हो
 मन की बात ,
और रह जाये 
मन की मन ही में ...

खुद से खुद की ही
 बात करते रहे ,
और सुनते रहे
 खुद ही को ....

दबाते रहें अपने 
मन की बातों को ,
भर -भर के ठंडी 
सांसों से ........

भर दे मन को एक गहरी 
सीलन से ,
मार दे अपने 
मन की आवाज़ को ...

तो ये मन कब्रिस्तान ही
 बन जाता है ...

( पगडण्डीयां  में प्रकाशित )

( चित्र गूगल से साभार )

20 comments:


  1. y meri khamoshi bhi azeeb shay hai !!!!!!! mere lafz utar aay prashn bankar teri aankho mai.......NEELIMA

    SUPERB

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    1. बहुत शुक्रिया नीलिमा जी

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    1. बहुत शुक्रिया सरस जी

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  3. बहुत सुन्दर शब्दों में सच कहा आपने ......................

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    1. बहुत शुक्रिया अरुणा जी

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    1. बहुत शुक्रिया वंदना जी

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  5. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार (26-04-2013) के चर्चा मंच 1226 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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    1. बहुत शुक्रिया अरुण जी

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  6. बहुत सुन्दर रचना ............ये मन ही तो हमारा सच्चा साथी है

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    1. बहुत शुक्रिया संध्या जी

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  7. बेहतरीन रचना | बधाई

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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    1. बहुत शुक्रिया तुषार राज जी

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  8. वाह ....... बेहतरीन

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    1. बहुत शुक्रिया सदा जी

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  9. बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति!
    साझा करने के लिए धन्यवाद!

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    1. बहुत शुक्रिया रूपचन्द्र शास्त्री जी

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