Monday, 15 April 2013

ਇਹ ਮੇਰਾ ਦਿਲ ਚੰਦਰਾ ਹੈ ...( यह मेरा दिल पागल है ...)

ਵੇ ਚੰਨ
ਤੈਨੂ ਵੇਖ ਕੇ 
ਮੇਨੂ ਉਸਦੀ ਯਾਦ 
 ਜਾਂਦੀ ਹੈ..

ਉਸਦੀ ਸੂਰ੍ਤ  
ਤੂ ਦਿਸਦਾ ਹੈ 
ਮੇਂਨੂ ...!


ਨਾ ਤੂ ਮੇਰਾ ਹੈ 
ਨਾ ਓਹ ਵੀ ਮੇਰਾ...

ਇਹ ਰਾਜ਼  
ਚੰਦਰਾ ਦਿਲ
ਹਾਲੇ ਵੀ ਨਹੀ 
ਸਮਝਿਆ...

ਦੂਰ ਰਹਿਣ ਵਾਲੇ
ਦੂਰੋਂ ਹੀ ਦਿਸ੍ਣ ਵਾਲੇ
ਕਦੇ ਅਪਣੇ ਵੀ ਹੁੰਦੇ ਹੈ ?
ਇਹ ਗਲਮੇਰਾ
ਚੰਦਰਾ ਦਿਲ 
ਸਮਝਣਾ ਨਹੀਂ ਚਾਹੁੰਦਾ...

ਇਹ ਮੇਰਾ ਦਿਲ
ਚੰਦਰਾ ਹੈ 
ਤੇ
ਚੰਦਰਾ ਹੀ ਰਵੇਗਾ...

ਤੇਨੁ ਵੇਖਣ ਦੇ ਸੋ 
ਬਹਾਨੇ ਕਢ ਕੇ 
ਉਸਨੂੰ ਯਾਦ ਕਰਨਾ 
ਵੀ ਤਾਂ
ਨਹੀ ਭੁਲੇਗਾ...
..............................................................................................
ओ चाँद 
तुझे देख कर 
मुझे उसकी याद 
आ जाती है ...

उसकी सूरत  में 
तू  दिखाई देता है 
मुझे ...

ना तू मेरा है 
ना ही वो मेरा है ...

यह राज़  अभी भी 
यह पागल दिल 
नहीं समझा ...

दूर रहने वाले 
दूर से ही दिखने वाले 
कभी अपने हुए है क्या ?
यह बात , मेरा 
पागल दिल समझना 
नहीं चाहता ...

यह मेरा दिल पागल है ,
पागल ही 
रहेगा ...

तुझे देखने के 
सौ बहाने 
निकाल कर , उसे 
याद करना भी नहीं भूलेगा ....

( चित्र गूगल से साभार )



28 comments:

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    1. बहुत शुक्रिया कालिपद जी

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    1. बहुत शुक्रिया संगीता जी

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  3. वाह ..... क्‍या बात है ....

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    1. बहुत शुक्रिया सदा जी

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  4. वो छिपे रहते हैं इस चाँद में कहीं ... ओर उनकी तस्वीर नज़र आती है ...

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  5. सही कहा दिल तो पागल है

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    1. सच में दिल तो पागल है ....बहुत शुक्रिया वंदना जी

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  6. चांद की खूबसूरती दूर से ही भले लगती है। दिल पर रोक किसी की है नहीं उसमें कई चीजों को पाने की मंशा होती है पर वास्तव उससे भिन्न होता है। हजारों समझौतें करने पडते हैं। बस बिना पाए उसे देख कर, सौ बार बहाने बना कर देख कर सुख मानने की बात प्रेम की पवित्रता को लेकर आती जो श्रेष्ठतम् है।

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    1. बहुत शुक्रिया विजय जी अमुल्य टिप्पणी के लिए

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    1. हाँ जी सही कहा .....बहुत शुक्रिया अज़ीज़ जौनपुरी जी

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  8. सुंदर भावभरी रचना.अच्छी प्रस्तुति .बधाई .

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    1. बहुत शुक्रिया मदन मोहन जी

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    1. बहुत शुक्रिया राजेन्द्र कुमार जी

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  10. आपके इन लाइन के लिए स्वपन शैल मञ्जूषा की दो लाइन
    तू मेरा है मैं तेरी हूँ
    ये तू जाने या मैं जानूं

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    1. हार्दिक आभार रमाकांत सिंह जी

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  11. प्रेम की गहन अनुभूति
    सुंदर रचना
    बधाई

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    1. बहुत शुक्रिया ज्योति खरे जी

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    1. हार्दिक आभार धीरेन्द्र सिंह जी

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  13. खूबसूरत रचना

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    1. हार्दिक आभार नीलिमा जी

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  14. उफ़ !
    क्यों है ये पागलपन ?

    :-&



    सुंदर अभिव्यक्ति ....... पागलपन की !

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