Monday, 15 April 2013

अब तो यही अरदास है , हे प्रभु ...!

जीवन की ढलती संध्या 
देख गहराता अँधेरा 
बाहर कम भीतर अधिक 
अब एक तुझे ही पुकारता मन...

हे प्रभु ....!

तेरे इस असार -संसार में
हमने कुछ न किया
,ना तुझे याद किया ,
न ही प्राणी मात्र के लिए
ना ही प्रयास किया
मानवता को बचाने का....

बस किया तो यही एक काम
,बाँट दिया एक इन्सान को
दूसरे से....


अब जीवन की ढलती सांझ में 
साल रहा है बस यही भय 
क्या मुहं ले कर आऊं पास तेरे....

अब तो यही अरदास है 
हे प्रभु ...!
दे दो मुझको 
बस एक ही मौका ,
तेरी हर कसौटी पर
खरा उतर के मैं दिखलाऊं ....


( चित्र गूगल से साभार )