Tuesday, 21 May 2013

जिन्दगी हर कोई जीता है ...


जिन्दगी क्या है ...!
हर कोई जीता है 
लेकिन ,
क्या हर कोई जीता है जिन्दगी ,
जिन्दगी की तरह ...!

पर नहीं शायद ,
कोई- कोई ही जीता है जिन्दगी ,
जिन्दगी की तरह ...

किसी को यह फूलों की राह
 नज़र आती है ,
कोई इसमें काँटों की चुभन की 
शंका लिए कदम ही 
नहीं बढ़ाता ...

चलने वाला
 काँटों से बचाता खुद को ,
कभी झेलता , 
 अपनी मंजिल भी पाता  है और 
फूलों की महक भी ...

रुक कर ठिठकने  वाला
 ना मंजिल पाता है 
और ना ही फूलों की महक ही ....

किसी को जिन्दगी लहराते -उफनते 
 सागर की तरह लगती  ,तो 
किसी को गहरे सागर की तरह ...

जो डर  जाता है 
सागर की गहराई से 
 खड़ा रहता है किनारे पर ही 
वह डर कर 
ना पार उतरता है ना मोती
 ही पाता है ...
लहराते -उफनते सागर में जो उतरता है 
वह पार भी जाता है , 
मोती भी पाता है ...