Sunday, 8 December 2013

जहाँ धरती -गगन मिलते नहीं

हम  साथ -साथ 
चलते हुए 
कुछ ऐसे बिछड़े ,

अलग - अलग राह पर 
कुछ ऐसे घूमे 
एक दायरे में ही बंधकर
रह गए

जहाँ से 
ना तुम निकल पाए ,
ना ही निकल पायी मैं कभी ..

जान कर भी
 अनजान बन जाना 
कतरा कर 
करीब से अजनबी बन कर 
निकल जाना 

बन्धनों से जकड़े  
 दूर से
एक- दूसरे की तरफ 
मायूसी से ताकते हुए ...

अक्सर  इस दायरे से 
जब भी 
धुंआ बन उड़ जाती हूँ ,

 तुम्हें
अपने सामने ही  पाती हूँ


तुम्हारा  हाथ

एक बार फिर से 
थाम कर निकल  पड़ती हूँ 
क्षितज के पार 
जहाँ धरती -गगन मिलते नहीं 
लेकिन 
मिलते से प्रतीत तो होते हैं।

(चित्र गूगल )