Wednesday, 18 December 2013

आओ कान्हा भोग लगाओ


भर कर थाली
छप्पन भोग की ,
कब से रही पुकार तुम्हें
आओ  कान्हा भोग लगाओ

 सुनाई नहीं देता क्या
एक बार में ही तुमको !
सारा काम -काज मैं छोड़ कर बैठी
आओ कान्हा भोग लगाओ

मेरे बालक भी हैं भूखे बैठे ,
प्रेम पुकार को करते अनसुनी
तुम कहाँ छुपे हो बैठे
आओ कान्हा भोग लगाओ

अबकी बेर है आखिरी बारी
फिर न तुमको पुकारूंगी
नहीं आओगे फिर तुम जानो ,
लाठी मेरे पास पड़ी है
कब से रही पुकार तुम्हें
आओ  कान्हा भोग लगाओ





5 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (21-12-2013) "हर टुकड़े में चांद" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1468 पर होगी.
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है.
    सादर...!

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  2. कोमल भावो की
    बेहतरीन........

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