Tuesday, 10 December 2013

बात एक रात की ...

बात एक रात की। एक सच्ची घटना पर आधारित है ये कविता। 1971 में जब हिंदुस्तान और पाकिस्तान का युद्ध हुआ था। उन्ही दिनों की एक रात की बात है। मेरी माँ हैम तीन बहनों के साथ अपने मायके में ही थी। वह ज़िद कर रही थी कि वह हम तीनो को एक साथ एक ही चारपाई पर लेकर सोएगी। तब मैं तीन साल की ही थी। बड़ी दीदी मीनाक्षी 6 साल और छोटी पूजा मात्र चार माह की। माँ के मुख से कई बार सुनी ये घटना कब काव्य का रूप ले लिया। मालूम ही नहीं चला।

बात एक युद्ध के 
बादलों से बरसते बमों की 
काली रात में 
प्यार और ममता की है ...

जहाँ एक माँ ने ,
एक दूसरी माँ को अपनी 
तीन बच्चियों के साथ
लगभग सिकुड़ कर
सोते देखा तो पूछ बैठी … 


कि  ऐसे क्यूँ कर रही हो ?
दूसरी माँ सहमते हुए से
बोली बमों की बारिश में
कही कोई बम इधर भी
आ गिरा तो हम सब
एक साथ ही जाएँगी ...


पहली माँ हंस पड़ी
अरी,फिर बचेगा
तो कोई भी नहीं ,
लाओ एक बच्ची को
मुझे देदो ,

पर दूसरी माँ
अपनी बच्चियों को
अपने में समेटते ,सहलाते
हुए बोली नहीं -नहीं ...


पहली माँ ने बड़े दुलारते हुए
कहा चल मैं भी 

आज तेरे साथ ही सोती हूँ ,
हैरान होती हुए
दूसरी बोली, क्यूँ तुम क्यूँ ?
पहली माँ बोली अरी !!
मैं भी तेरी माँ हूँ ,
क्या मै तेरे बिन जी पाउंगी
भला ...!
उस रात बारिश तो हुई  थी 

पर
बमों की नहीं ,

प्यार की - ममता की
जिसमे भीगती रही दो माएं 

और
उनकी चार बेटियां ,

सारी रात .........

( "स्त्री हो कर सवाल करती है " में प्रकाशित )