Wednesday, 1 April 2015

कुछ बाते रह गई मन की मन में

कुछ बाते कही तुमने ,
कुछ रह गई अनकही।
मन की कही भी ,
और रह गई  मन की मन में।

दूर बैठा कोई कैसे
सुनता - कहता है
समझता भी कैसे है !
बिना चिठ्ठी ,
बिना तार
कैसे होता है संचार ।

बातें जो कही
वह  तो सुन  ही नहीं पाई
अन कहा ही
देता रहा सुनाई।

खामोशी में जो
कोलाहल होता है
वह बतकही में कहाँ !