Wednesday, 1 April 2015

कुछ बाते रह गई मन की मन में

कुछ बाते कही तुमने ,
कुछ रह गई अनकही।
मन की कही भी ,
और रह गई  मन की मन में।

दूर बैठा कोई कैसे
सुनता - कहता है
समझता भी कैसे है !
बिना चिठ्ठी ,
बिना तार
कैसे होता है संचार ।

बातें जो कही
वह  तो सुन  ही नहीं पाई
अन कहा ही
देता रहा सुनाई।

खामोशी में जो
कोलाहल होता है
वह बतकही में कहाँ !







7 comments:

  1. बहुत बढिया..उपासना जी..

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  2. आपकी इस प्रस्तति का लिंक 02-04-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1936 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. दूर बैठा कोई कैसे
    सुनता - कहता है
    समझता भी कैसे है !
    बिना चिठ्ठी ,
    बिना तार
    कैसे होता है संचार ।

    ultimate lines...superb.

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  4. हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शुक्रवार (03-04-2015) को "रह गई मन की मन मे" { चर्चा - 1937 } पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. सुन्दर ...नमस्ते दी

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  6. बातें जो कही
    वह तो सुन ही नहीं पाई
    अन कहा ही
    देता रहा सुनाई।

    खामोशी में जो
    कोलाहल होता है
    वह बतकही में कहाँ !

    बहुत गहरी बात आपने कितनी सादगी से कह दी ......
    इस बेहतरीन रचना के लिए मेरी शुभकामनायें स्वीकारिए ......

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