Sunday, 5 April 2015

बेटे भी तो हैं सृष्टि के रचियता से.....

  बेटियां है अगर
लक्ष्मी, सरस्वती
और दुर्गा का रूप ।

 बेटे भी तो हैं प्रतिरूप
 नारायण, ब्रह्मा और शिव का।
सृष्टि के रचियता से
पालक भी हैं।

बेटियां अगर नाज़ है
तो बेटे भी मान है
 गौरव है
सीमा के प्रहरी है
देश के रक्षक है।

जैसे सर का हो ताज,
बहनों के होठों की मुस्कान,
माँ -बाप की आस है ,
बुढ़ापे की लाठी भी तो हैं बेटे।

 माँ की बुझती आँखों की
रोशनी है तो
पिता के कंधो का भार संभाले
वो  कोल्हू के बैल भी हैं।

निकल पड़ते हैं
अँधेरे में ही
तलाशते अपनी मंज़िल
बिन डरे
बिन थके।

दम लेते हैं मंज़िल पर जा कर
भर लेते हैं आसमान
बाँहों में अपने,
इस धरा के सरताज़ हैं बेटे।