Friday, 10 April 2015

प्रेम तुम जीत हो....

प्रेम
तुम जीत हो
लेकिन
हारा है हर कोई
तुम्हें पाने
की चाहत में...

 फिर
मैं क्यों कर जीत पाती ...

प्रेम
जहाँ तुम
वही मेरा डेरा

तुम्हारे कदमों
को पहचान
चली आती हूँ...

ढूंढ ही लेती हूँ
तुम्हें
साथ है सदा का,
जैसे
परछाई...

क्योंकि प्रेम
 तुम
प्रकाश हो
अंधकार नहीं....

10 comments:

  1. हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल रविवार (12-04-2015) को "झिलमिल करतीं सूर्य रश्मियाँ.." {चर्चा - 1945} पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. प्रेम बस होता है .सुन्दर रचना है उपासना सियाग जी .

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  3. प्रेम में हार जीत कहाँ...प्रेम हार कर भी जीत है..बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  4. सुन्दर रचना

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  5. प्रेम तुम प्रहाश हो
    अन्धकार नहीं ........बहुत सुन्दर

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  6. प्रेम
    तुम जीत हो
    लेकिन
    हारा है हर कोई
    तुम्हें पाने
    की चाहत में...

    ध्रुवसत्य।
    सुंदर रचना।

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  7. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    शुभकामनाएँ।
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

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  8. प्रेम के प्रकाश का छुप के रह पाना भी कहाँ संभव होता है ...
    बहुत सुन्दर रचना ...

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  9. बहुत सुंदर रचना

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