Sunday, 6 October 2013

माँ के साथ ये सोतैली का शब्द किसने जोड़ा...

जब पीछे मुड़ कर
 देखती हूँ
तो सोचती हूँ ,मेरा जीवन
जैसे
एक ऐसा हरा भरा  दरख्त
जिसकी छाँव में कोई बैठा ही नहीं …

 माली ने जिसे एक आँगन
से दूसरे आँगन में
एक मुरझाये
दरख्त के सामने रोप  दिया …

माली ने पानी भी दिया तो अहसान
की  नज़र से ,
और मैं अहसान को ही प्यार समझती रही ,
दरख्त ने जड़ फैलाई
सहमे -सहमे से हुए ...

आँगन में
दो नन्हे से प्यारे फूलों को
देखा जब ममता की तलाश में
झुलसते ,
 अपनी डालियों से ममता की
घनी छाँव में लेना भी चाहा
 बेरहमी से  मेरी टहनिया ही काट डाली ...

नोच डाला
माली ने मुझ पर लगे
फूलों को भी बेरहमी से ,
माली  कभी मेरी छाँव में
सुस्ताया भी
नज़र में उसके वही मुरझाया
दरख्त ही रहा  ….

मैं सोचती हूँ
 माँ के साथ ममता
का शब्द ही जुड़ता है ,
ये सोतैली का शब्द किसने जोड़ा...

8 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - सोमवार - 07/10/2013 को
    अब देश में न आना तुम गाधी
    - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः31
    पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (07-10-2013) नवरात्र गुज़ारिश : चर्चामंच 1391 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बेह्तरीन अभिव्यक्ति!!शुभकामनायें.

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन बुलेटिन में लिंक्स हों - ज़रूरी तो नहीं (5) मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. बेहतरीन अभिव्यक्ति .

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  6. कुछ कैकेयी जैसी माताओं ने जुड़वा दिया !
    मार्मिक अभिव्यक्ति !

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