Monday, 28 October 2013

इन मुखोटों की सच्चाई तुम क्या जानो ...!

मैं अक्सर
बड़े शहरों के
बड़े -बड़े बाजारों में 
लोगों की चमक - दमक
वाली भीड़ में गुम सी
हो जाती हूँ ...
मैं अक्सर
ऐसे  बाज़ार में,
सामान कम लेने 
 लोगों को पढने ज्यादा
जाती हूँ

सोचती हूँ कि मेरे देश में
जैसे 
 कोई भी समस्या ही
नहीं है ,
ना भूख ना गरीबी
हर और खुशहाली

चलते -चलते
एक शक्स को पूछ  ही बैठी
 कितनी जगमगाहट है यहाँ 
खिलखिलाते चेहरे ,
ख़ुशी ही ख़ुशी
कोई भी दुःख ,गम ,परेशानी
 है ही नहीं यहाँ



वह  कडवी -कुनैन सी बोली बोला 
,कैसी चमक ,
कहाँ की दमक
इन चेहरों के
पीछे की सच्चाई
तुम क्या जानो

कार ,मकान, बिजनेस ,क़र्ज़ ,
तुम क्या जानो,
ना जाने
क्या -क्या भूलने आते है
यहाँ !
इन मुखोटों की
सच्चाई तुम क्या जानो ...!