प्रेम
तुम जीत हो
लेकिन
हारा है हर कोई
तुम्हें पाने
की चाहत में...
फिर
मैं क्यों कर जीत पाती ...
प्रेम
जहाँ तुम
वही मेरा डेरा
तुम्हारे कदमों
को पहचान
चली आती हूँ...
ढूंढ ही लेती हूँ
तुम्हें
साथ है सदा का,
जैसे
परछाई...
क्योंकि प्रेम
तुम
प्रकाश हो
अंधकार नहीं....
तुम जीत हो
लेकिन
हारा है हर कोई
तुम्हें पाने
की चाहत में...
फिर
मैं क्यों कर जीत पाती ...
प्रेम
जहाँ तुम
वही मेरा डेरा
तुम्हारे कदमों
को पहचान
चली आती हूँ...
ढूंढ ही लेती हूँ
तुम्हें
साथ है सदा का,
जैसे
परछाई...
क्योंकि प्रेम
तुम
प्रकाश हो
अंधकार नहीं....