Wednesday, 25 March 2015

प्रेम कभी -कभी तुम.....

प्रेम
कभी -कभी
तुम
दुःख हो ,विषाद हो।

और
कभी कभी
तुम
उदासी भी हो।

दूर से नज़र आती
रोशनी हो जैसे।

जो
दिखाई तो दे
मगर
उजाला ना करे।

जलती रहे
दिल में
 जलाये ही दिल को।

प्रेम
कभी -कभी
तुम ......


15 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 26-03-2015 को चर्चा मंच की चर्चा गांधारी-सा दर्शन {चर्चा - 1929 } पर दिया जाएगा
    धन्यवाद

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    1. बहुत शुक्रिया जी...

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    1. बहुत शुक्रिया जी

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  3. सच कहा.
    प्रेम जो दिखाई देता हैं वो होता नही,जो होता हैं वो दीखता नही..

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    1. बहुत शुक्रिया जी....

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  4. बहुत ही बेहतरीन रचना..

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    1. बहुत शुक्रिया जी..

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  5. खूबसूरत अभिव्यक्ति।

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    1. बहुत शुक्रिया जी......

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  6. बहुत सुंदर रचना ....

    प्रेम !
    ऐसा ही है ....
    कभी कभी ही नहीं, हमेशा ही .....

    आग का दरिया है और डूब के जाना है ......

    शुभकामनायें .....

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    1. बहुत शुक्रिया जी।
      हमेशा नहीं ! कभी -कभी ही।
      प्रेम तो हमेशा मुस्कान ही है , दिल को छू जाये ऐसा अहसास है।

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    2. सही कहा आपने ....

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    3. प्रेम
      कभी -कभी
      तुम ......
      छुप कर आते हो
      कायर से
      प्रेम चुपचाप किया जाये तो गुनाह बन जाता
      स्वीकृति मिल जाए तो पुलकित कर देता मन का कोना

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  7. शानदार पोस्ट...

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