Wednesday, 24 September 2014

गीत जो तुम मेरे लिए गुनगुनाते हो ....

गीत जो तुम ,
मेरे लिए
गुनगुनाते हो
हवाएं मुझ तक
पहुंचा देती है ....लाल

 कुछ गीत  सितारों में
टांक दिए हैं मैंने ,
कोई
टूटता सितारा
तुम्हारा गाया गीत
गुनगुना जाता है ..

कुछ गीत मैंने
कशीदाकारी से
फूल बना कर
आंचल पर सजा लिए ,
हर गीत फूल की
तरह
तुम्हारी याद को
महका जाता है ...

कुछ गीत बिखेर दिए
यूँ ही हवाओं में ,
लिपटी रहती हूँ तुम्हारे
अहसासों में ,
कभी कोई गीत  छू जाता है
मेरा अंतर्मन
तुम्हारी याद में
मैं भी गुनगुना उठती हूँ ...





Tuesday, 23 September 2014

काश कोई ऐसा संत सच में हो...

सुबह का समय
इंतजा़र एक सीटी की
कर्कश आवाज़ का...

सुन कर लोग
निकल आते हैं घरों से
जैसे
दवा डाल देने पर
कॉक्रोच।

हाथों में
अपने ही घर का कूड़ा लिए
और नाक ढके या
सांस रोके....

कूड़े वाला
चुप ,निर्विकार संत सा
सबका कूड़ा
इकट्ठा ,
एकसार करता
आगे बढ़ जाता ..

सोचती हूँ
काश कोई ऐसा संत
सच में हो
जो मानव हृदय के
कूड़े को कहीं दूर ले जाकर
फैंक दे ।

Thursday, 18 September 2014

रहने दो बेजुबान मेरे शब्दों को....

शब्द बिखरे पड़े हैं 
इर्द -गिर्द 
मेरे और तुम्हारे।
चुप तुम हो,
चुप मैं भी तो हूँ..


कुछ शब्द 
चुन लिए हैं
मैंने तुम्हारे लिए
लेकिन
बंद है मुट्ठी मेरी ,
मेरी जुबान की तरह ।

रहने दो बेजुबान 
मेरे शब्दों को
जब तक कि
तुम चुन ना लो 
कुछ शब्द मेरे लिए ...

Sunday, 24 August 2014

तुम्हारा एक नाम रखूं ?

तुम्हारा
 एक नाम रखूं ?
क्या नाम रखूं
 तुम्हारा !
प्रेम !
नहीं तुम्हारा नाम प्रेम नहीं !
वो प्रेम ही क्या
जो छुपाया जाये।

नफरत !
नहीं नफरत भी नहीं !
मेरे शब्दकोष में
यह शब्द ही नहीं है।

इंतज़ार !
नहीं इंतज़ार भी नहीं !
साथ रहने वालों का
कैसा इंतज़ार।

धोखा !
हाँ तुम धोखा ही हो ,
छलिया हो ,
भ्रम ही तो हो
यही नाम रखूंगी तुम्हारा।

जिक्र होगा जब कभी
धोखे का
तुम्हारा ही नाम आएगा
भ्रम में रहेगा सारा संसार
और हर बार छला जायेगा। 

Saturday, 16 August 2014

मेरे पास अभी भी......

तुम्हारे प्यार को मैंने
 पिंजरे में बंद कर
पाला चिड़िया की तरह
बरसों तक आशा के दाने ,
भ्रम का पानी पिलाती रही
कि तुम कभी तो आओगे ...

 यूँ ही तुम्हारे अहसाह को
अपने आस-पास रेशमी तारों
का जाल सा बुनती रही ...

 कर दिया मुक्त
लो आज मैंने आज
इस चिड़िया को
उड़ा दिया दूर गगन में....

लेकिन
मैंने  परों में थोड़े से रेशमी
तार भी उलझा दिए है ,
क्यूँ कि
मेरे पास अभी भी कुछ आशा के
दाने और भ्रम का पानी बचा है .

Wednesday, 23 July 2014

शीशे पर निशान उभरे हैं या मेरे हृदय पर

हर रोज़
एक नन्हीं  सी चिड़िया
मेरी खिड़की के शीशे से
अपनी चोंच टकराती है ,
खट-खट की
खटखटाहट से चौंक जाती हूँ मैं ,

मानो कमरे के भीतर
आने का रास्ता ढूंढ  रही हो ,
उसकी रोज़ -रोज़ की
खट -खट से सोच में पड़ जाती हूँ  मैं ,

 वह क्यों चाहती है
भीतर आना
अपने आज़ाद परों से परवाज़
क्यों नहीं भरती
क्या उसे आज़ादी पसंद नहीं !

कोई भी तो नहीं उसका यहाँ
बेगाने लोग , बेगाने चेहरे
क्या मालूम
कहीं कोई बहेलिया ही हो भीतर !
जाल में फ़ांस ले ,
पर कतर दे !

वह हर रोज़ आकर
शीशे को खटखटाती है या
मोह-माया के द्वार को खटखटाती है
उसे नहीं मालूम !

मालूम तो मुझे भी नहीं कि
चोंच की खट -खट से
शीशे पर  निशान उभरे हैं
या मेरे हृदय पर
मैं नहीं चाहती उसका भीतर आना
पर चिड़िया की खटखटाहट और
मेरे हृदय की छटपटाहट अभी भी जारी है !




Monday, 7 July 2014

तुमको देखा तो ये ख़याल आया ...

 बरसों बाद 
तुमको देखा तो ये 
ख़याल आया ...

 'कि  जिन्दगी धूप
तुम घना साया !'

नहीं ऐसा तो नहीं सोचा मैंने !
जिंदगी  में ,
 विटामिन- डी के लिए
धूप की भी तो जरुरत 
होती है

तुम को देखा तो 
मुझे ख्याल आया 
उन खतों का
जो तुमने 
 लिखे थे कभी मुझे ...

वे खत
 मैंने अपनी यादों में
और खज़ाने की तरह 
एक संदुकची में संभाल कर 
रखे है
देख कर उनको 
तुम्हें भी याद कर लिया करती हूँ

तुमको देखा तो
अब फिर से ख्याल आया 
जो मैंने तुम्हें ख़त लिखे थे 
वे  मुझे वापस लौटा दो ...

देखो गलत ना समझो मुझे 
वे  अब तुम्हारे भी किस
 काम के है
समझने की कोशिश तो 
करो जरा मुझे ...!!

अरे !!
महंगे होते जा रहे है 
गैस -सिलेंडर। 
अब  चूल्हा जलाने के काम 
 आयेंगे ना 


तुम्हारे और मेरे ख़त ...!!!