Sunday, 24 August 2014

तुम्हारा एक नाम रखूं ?

तुम्हारा
 एक नाम रखूं ?
क्या नाम रखूं
 तुम्हारा !
प्रेम !
नहीं तुम्हारा नाम प्रेम नहीं !
वो प्रेम ही क्या
जो छुपाया जाये।

नफरत !
नहीं नफरत भी नहीं !
मेरे शब्दकोष में
यह शब्द ही नहीं है।

इंतज़ार !
नहीं इंतज़ार भी नहीं !
साथ रहने वालों का
कैसा इंतज़ार।

धोखा !
हाँ तुम धोखा ही हो ,
छलिया हो ,
भ्रम ही तो हो
यही नाम रखूंगी तुम्हारा।

जिक्र होगा जब कभी
धोखे का
तुम्हारा ही नाम आएगा
भ्रम में रहेगा सारा संसार
और हर बार छला जायेगा।