Thursday, 18 September 2014

रहने दो बेजुबान मेरे शब्दों को....

शब्द बिखरे पड़े हैं 
इर्द -गिर्द 
मेरे और तुम्हारे।
चुप तुम हो,
चुप मैं भी तो हूँ..


कुछ शब्द 
चुन लिए हैं
मैंने तुम्हारे लिए
लेकिन
बंद है मुट्ठी मेरी ,
मेरी जुबान की तरह ।

रहने दो बेजुबान 
मेरे शब्दों को
जब तक कि
तुम चुन ना लो 
कुछ शब्द मेरे लिए ...

15 comments:

  1. Waah... Jab tak tum na kaho main kyun kahun.. Bahut sunder prastuti....!!!

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  2. वाह गज़ब की वफ़ादार
    रहने दो बेजुबान
    मेरे शब्दों को
    जब तक कि
    तुम चुन ना लो
    कुछ शब्द मेरे लिए ..

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  3. आपकी लिखी रचना शनिवार 20 सितम्बर 2014 को लिंक की जाएगी........... http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  4. इस अबोले को तोड़ने के लिये किसीको तो पहल करनी ही होगी ! क्यों न आप ही जुबान दे दें अपने शब्दों को ! सोचने को विवश करती बहुत सुन्दर रचना !

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (20-09-2014) को "हम बेवफ़ा तो हरगिज न थे" (चर्चा मंच 1742) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. अभिव्यक्ति की पूर्णता के लिए दोनों पक्षों को भागीदारी आवश्यक है .

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  7. ओह... चुप ही रहने दो.. समझ सको तो समझो... मैं की भाषा ..

    गजब

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  8. शब्दों की अनवरत और....खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.....

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  9. जब तक कि
    तुम चुन ना लो
    कुछ शब्द मेरे लिए ...,सुंदर रचना !

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  10. बहुत सुन्दर है।

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  11. बहुत ही सुंदर रचना !....
    एक प्रतिउत्तर मेरी और से भी ....

    चुप तुम हो, चुप मैं हूँ
    जरूरत है कहाँ शब्दों की
    शब्द तो मात्र ध्वनि हैं
    नहीं जरूरत भावों को इसकी
    नहीं रोक सकता कोई बंद
    आवाज़ चुप की,
    हमारे चुप की ......

    शुभ कामनाएँ !

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  12. बहुत खूब
    चुप्पिओं को तोड़ती चुप्पी

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