Monday, 29 September 2014

दस्तक अब भी दी जा रही है..

बंद दरवाजे पर
दस्तक दी जाती रही
 दरवाजा नहीं खुला ।

मगर
दरवाजे के उस पार
आवाज़ें थी , हलचल थी
फिर  दरवाजा क्यों नहीं खुला !

 दरवाजे खुलने की कुछ शर्त थी शायद
 जब दोनों तरफ कुन्डी लगी थी
मजबूत ताले थे
तो  दस्तक का औचित्य ही क्या था !

क्या यह मात्र औपचारिकता थी
या सुलह की पहल
 मालूम नहीं !

दस्तक अब भी दी जा रही है
कुन्डीयों , तालों के टूटने का इंतज़ार है ...

14 comments:

  1. सुन्दर रहस्य बोध और बहुत गंभीर रचना

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  2. दरवाजे खुलने की कुछ शर्त थी शायद
    जब दोनों तरफ कुन्डी लगी थी
    मजबूत ताले थे
    तो दस्तक का औचित्य ही क्या था !
    ...बहुत गहन और प्रभावी अभिव्यक्ति...

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  3. बहुत ही रहिस्य से भरी पँक्तिया
    आपना ब्लॉग , सफर आपका ब्लॉग ऍग्रीगेटर पर लगाकर अधिक लौगो ता पँहुचाऐ

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  4. बहुत सुन्दर..
    विजयादशमी की शुभकामनायें!

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  5. http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/10/2014-6.html

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  6. आपकी ये रचना चर्चामंच http://charchamanch.blogspot.in/ पर चर्चा हेतू 11 अक्टूबर को प्रस्तुत की जाएगी। आप भी आइए।
    स्वयं शून्य

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  7. बहुत खूब , मंगलकामनाएं आपको !

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