Wednesday, 24 September 2014

गीत जो तुम मेरे लिए गुनगुनाते हो ....

गीत जो तुम ,
मेरे लिए
गुनगुनाते हो
हवाएं मुझ तक
पहुंचा देती है ......

 कुछ गीतों को
 सितारों में
टांक दिए हैं मैंने ,
कोई
टूटता सितारा
तुम्हारा गाया गीत
गुनगुना जाता है .....

कुछ गीतों को मैंने
कशीदाकारी से
फूल बना कर
आंचल पर सजा लिए ,
हर गीत फूल की
तरह
तुम्हारी याद को
महका जाता है ........

कुछ गीत बिखेर दिए
यूँ ही हवाओं में ,
लिपटी रहती हूँ तुम्हारे
अहसासों में ,
कभी कोई गीत  छू जाता है
मेरा अंतर्मन
तुम्हारी याद में
मैं भी गुनगुना उठती हूँ ...





18 comments:

  1. बहुत प्यारी कविता...,उपासना जी..:)

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    1. हार्दिक धन्यवाद

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  2. सुन्दर भावनाओं में सुगंध का लेप करती बहुत ही प्यारी रचना

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    1. हार्दिक धन्यवाद

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  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (26.09.2014) को "नवरात महिमा" (चर्चा अंक-1748)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद। नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें।

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    1. हार्दिक धन्यवाद

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  4. वाह ! बहुत ही कोमल, सुन्दर एवं अनुराग की अनुपम भावनाओं से सिक्त उत्कृष्ट रचना ! अति सुन्दर !

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    1. हार्दिक धन्यवाद

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  5. बहुत कोमल अहसास...सुन्दर प्रस्तुति...

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    1. हार्दिक धन्यवाद ...

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  6. कोमल भावना की बहुत ही उत्कृष्ट काव्यमय अभिव्यक्ति !
    नवरात्रि की हार्दीक शुभकामनाएं !
    शुम्भ निशुम्भ बध -भाग ३

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी ...

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  7. एहसास की सुंदर अभिव्यक्ति ! ......
    बहुत बहुत शुभकामनायें
    आपके इस सुंदर काव्य लेखन और आपके जन्मदिन के लिए ! ....

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    1. फिराक़’ बदल कर भेष मिलता है कोई क़ाफ़िर
      कभी हम जान लेते हैं कभी पहचान लेते हैं......

      जन्म -दिन की शुभकामना देने और याद रखने के लिए हार्दिक धन्यवाद जी ...

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