Monday, 29 September 2014

यह कैसा लेख था ...

उस रात चाँद  चुप सा था
सितारे भी खामोश से
हवा भी दम साधे हुए थी ।

सन्नाटे में
कोई तो था
जो चुपके से आया

मन के
कोरे कागज़ पर
बिन  कलम , बिना सियाही
लिख  गया था
कुछ लेख ।

लेकिन
 यह कैसा लेख था
जो लिखा तो है
पढ़ा क्यों नहीं जाता

शायद यह किस्मत का लिखा
कोई लेख ही है ।

जो मन के कागज़ पर
ही लिखा  जाता है
माथे की लकीरों पर नहीं ।


7 comments:

  1. सुन्दर रचना बहुत खूब

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  2. सुंदर लेख , धन्यवाद !
    आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 1 . 10 . 2014 दिन बुद्धवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !
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  3. बेहतरीन प्रस्‍तुति

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  4. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 05/10/2014 को "प्रतिबिंब रूठता है” चर्चा मंच:1757 पर.

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  5. दीखत होय हो तो हर कोई बाँचे, आखर प्रकट न होय!

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  6. सुंदर भावपूर्ण रचना.

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