Saturday, 16 August 2014

मेरे पास अभी भी......

तुम्हारे प्यार को मैंने
 पिंजरे में बंद कर
पाला चिड़िया की तरह
बरसों तक आशा के दाने ,
भ्रम का पानी पिलाती रही
कि तुम कभी तो आओगे ...

 यूँ ही तुम्हारे अहसाह को
अपने आस-पास रेशमी तारों
का जाल सा बुनती रही ...

 कर दिया मुक्त
लो आज मैंने आज
इस चिड़िया को
उड़ा दिया दूर गगन में....

लेकिन
मैंने  परों में थोड़े से रेशमी
तार भी उलझा दिए है ,
क्यूँ कि
मेरे पास अभी भी कुछ आशा के
दाने और भ्रम का पानी बचा है .

10 comments:

  1. बेहद खुबसूरत अभिव्यक्ति
    मधुर रचना

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  2. आस है..जाती नहीं. सुन्दर रचना.

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  3. वाह ...बहुत ही अनुपम भावों को संयोजित किया है आपने सहजता से

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  4. सुंदर प्रस्तुति , आप की ये रचना चर्चामंच के लिए चुनी गई है , सोमवार दिनांक - 18 . 8 . 2014 को आपकी रचना का लिंक चर्चामंच पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  5. सुन्दर सृजन अहसास के कलम से उम्मीद की रौशनी

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  6. Prem ho to ummeedein barkaraar rahti hain...!!bahut lajawb!!

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