Monday, 29 July 2013

परछाइयाँ कब हुई अपनी ........

परछाइयों को
पकड़ने तो चली ,
परछाइयाँ कब हुई 
अपनी ,
अपनी न हुई
पकड़ना तो फिर भी
चाहा …

चाहा साथ निभाने की
शर्त लिए
साथ दिखाई तो देती रही
साथ फिर भी ना निभाया
इन परछाइयों ने  …

कभी आगे
कभी पीछे
कभी -कभी क़दमों तले
होने का भान रहता सदा
कदम से कदम ना मिलाया
इन परछाइयों ने  …।

ग़मों को बदली हो
दुःख का अँधेरा हो
साथ चलती परछाइयां
हो जाती गम
एक कदम भी साथ ना निभाया
इन परछाइयों ने  …….

कौन किसका साथ देता है
कब तक देता है
इन्सान यूँ ही भागता रहता है
इन परछाइयों को पकड़ता  ……


18 comments:

  1. परछायी तो परछायी होती है..बहुत सुन्दर..

    ReplyDelete
  2. आपकी यह पोस्ट आज के (३० जुलाई, २०१३) ब्लॉग बुलेटिन - एक बाज़ार लगा देखा मैंने पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

    ReplyDelete

  3. छाया तो छाया है ,ईमानदारी से साथ निभाता है
    latest post हमारे नेताजी
    latest postअनुभूति : वर्षा ऋतु

    ReplyDelete
  4. उम्दा है आदरेया-

    ReplyDelete
  5. बहुत सुन्दर भावमयी रचना...

    ReplyDelete
  6. एकदम सही....
    भावपूर्ण रचना...
    :-)

    ReplyDelete
  7. बहुत खूब,भावपूर्ण अभिव्यक्ति,,,

    RECENT POST: तेरी याद आ गई ...

    ReplyDelete
  8. भ्रम होता है बहुत कुछ
    अक्सर हमें अकेले ही बहुत कुछ सहना होता है, चलना होता है
    ऐसी परछाईयाँ तो मिलती ही रहेंगी ..
    सुन्दर !

    ReplyDelete
  9. परछाईयो को कोन पकड़ पाया है , बहुत सुंदर रचना



    यहाँ भी पधारे

    http://shoryamalik.blogspot.in/2013/07/blog-post_29.html

    ReplyDelete
  10. बहुत सही कहा परछाई तो परछाई ही होती है ....

    ReplyDelete
  11. परछाईओं के पीछे भागते खुद अपनी पहचान खो जाती है !
    बढ़िया !

    ReplyDelete




  12. बहुत खूब कहिन

    ReplyDelete
  13. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    ReplyDelete
  14. मेरा साया भी मुझसे शिकायत करता हैं :))) बहुत उम्दा

    ReplyDelete