Friday, 19 July 2013

यह दरख्त ना छाँव देता है ना राहत ...!

यादों के दरख्तों की पत्तियां 

 ना कभी पीली पड़ती है 

ना  ही गिर कर 
यहाँ -वहां बिखरती है ......



हर रोज़ एक नयी पत्ती 

उभर आती है याद की तरह 

दरख्त को अपने लपेटे 

में लेती हुयी ...


गर छू भी लो 

इन पत्तियों को 

छिल  जाते है घाव

रिस पड़ता है यादों का लहू ...


यह दरख्त  ना छाँव देता है 

ना राहत ...!

कुछ दे सुस्ताना भी चाहो 

यादों की धूप में मन 

झुलसता ही जाता है ...