Friday, 5 July 2013

बिन बैसाखियों के कहाँ चल पाती औरतें ...!

औरतों को मैंने नहीं देखा
चलते हुए कभी
उनको अपने पैरों पर 
चलती हैं वो सदा 
बैसाखियों के सहारे ही ...

चलती हैं वे बचपन में 
पिता का सहारा लिए 
भाई का सहारा लिए ...

बिन सहारे 
भयभीत होते चलती ...

यह बैसाखियाँ गवां देता है 
उनका आत्मविश्वास 
स्वाभिमान 
और निज पहचान भी ..

फिर कहाँ चल पाती
बिन सहारे वे 
तभी तो डोली में बैठा कर 
विदा की जाती है 
उतरते ही थमा दी जाती है 
नयी बैसाखियाँ ...

यह नयी बैसाखियाँ  लिए 
चलते हुए 
घुलती रहती है 
ग़लती रहती है , वे ...!

कभी गिरती तो
 कभी लड़खड़ाती 
भरभरा के गिरने को 
होती है , तभी 
उग आती है एक और
 बैसाखी ...

चलना तो पड़ता ही  है
लेकिन ...!
बिन बैसाखियों के कहाँ 
चल पाती औरतें ...!


(चित्र गूगल से साभार )