Sunday, 2 June 2013

क्यूंकि तुम प्रेम हो और प्रेम मैं भी हूँ .....

मैं प्रेम हूँ
और
तुम भी तो प्रेम ही हो।
प्रेम से अलग
 क्या नाम दूँ
तुम्हें भी और मुझे भी ...

कितनी सदियों से
और जन्मो से भी
हम साथ है
जुड़े हुए एक-दूसरे के
प्रेम में।

दिखावे की है लेकिन ये
समानांतर रेखाए
प्रेम ने तो अब भी बांधा
हुआ है
तुम्हें  भी और मुझे  भी।

क्यूंकि तुम प्रेम हो और
प्रेम मैं भी हूँ .......

18 comments:

  1. Kyuki tum prem ho mai bhi prem....wow bahut sunder rachna...upasna..

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  2. क्यूंकि.....
    तुम प्रेम हो....
    और प्रेम......
    मैं भी हूँ .......
    भाव प्रधान रचना
    अच्छी लगी

    सादर

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  3. बहुत सुंदर और अद्भुत प्रेम ...

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  4. प्रेम के अप्रतिम सौन्दर्य से छलकती रचना

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  5. प्रेम की पराकास्था ,प्रेम का नाम सिर्फ प्रेम

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  6. अद्भुत प्रेम की पराकाष्ठा..सुंदर रचना ,,,

    recent post : ऐसी गजल गाता नही,

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  7. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (03-06-2013) के :चर्चा मंच 1264 पर ,अपनी प्रतिक्रिया के लिए पधारें
    सूचनार्थ |

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    Replies
    1. प्रेम ही सत्यहै --सत्य ही ईश्वर है --इसलिए प्रेम ही ईश्वर है ----प्रश्नों का ऊत्तर है ---ऐसा बंधन जो मुक्त करता है

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  8. प्रेम ही सत्यहै --सत्य ही ईश्वर है --इसलिए प्रेम ही ईश्वर है ----प्रश्नों का ऊत्तर है ---ऐसा बंधन जो मुक्त करता है

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  9. सत्य ही ईश्वर है..बहुत सुन्दर प्रस्तुति..बधाई..उपासना जी..

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  10. प्रेम ही सत्य है-सुन्दर प्रस्तुति .बधाई
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  11. कोमल भाव लिए बहुत सुन्दर रचना...

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  12. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  13. सुन्दर....
    बहुत ही सुन्दर.....

    अनु

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