Tuesday, 18 June 2013

मरने से पहले कई-कई बार मरना क्यूँ ....

मर -मर के जीते है
 हम ,
हर रोज़
जीने के लिए ...

बस एक पल
जीने के लिए
ना जाने कितने
पल मरते हैं हम ...

 हुआ जब जन्म
तभी तय हुआ
मरने का दिन ,
तय नहीं जीने के दिन ...

ना जाने कितने
दिन है जीने के
यही सोच ,
हर दिन मरते हैं हम ...

कितने रंगों से सजा
ये जीवन
आशंकाओं के काले रंग
से रंगना क्यूँ ....

मरने से पहले
कई-कई बार मरना क्यूँ
जब तय है मरने का दिन ,
तो क्यूँ ना
हर पल -हर दिन जीवन का
भरपूर जियें हम ...

( चित्र गूगल से साभार )