Wednesday, 5 June 2013

पश्चाताप ....

लाचार, बेबस, कृशकाय ,
जर्जर वृद्ध ,
अपनी अवस्था को
झेलता ...

अपने कमरे की
धुंधली रौशनी में
अपने अंदर छाये
घने अँधेरे में एक प्यार
की किरण तलाशता ...

बाहर से उठती
तेज़ आवाजों में
पानी के लिए तरसती
अपनी आवाज़ को
को कहीं खोता ...

बिस्तर से उठने की
नाकाम
कोशिश करता
अचानक हूक सी उठी
दिल में
बद-दुआ सी जागी मन
में ...


बरबस
दीवार पर धूल जमी
अपने बाबूजी की तस्वीर
में से झांकती ,व्यंग से
चमकती आँखे देख
दिल
शर्म ,पश्चाताप ,
आँखे दुख
के आंसुओं से भर आयी ...