Wednesday, 19 June 2013

धरा पर एक ही सत्य है बस ईश्वर का नाम ही ...

ना चाहो तो भी
उठ जाता है मन में
एक प्रश्न ,
एक नादान बालक की तरह ...

मन करता है
सामने खड़े हो जाएं
ईश्वर के
और मांगे उत्तर ...

जब टूटे घर -आशियाने
सभी के
बस एक तेरा घर ही
रहा सलामत ...

 तुझे क्या दर्द ना आया ...!
तेरी ही गोद में पनपे
रहे खेलते जो ,
मिल गए मिट्टी में ,
हुए धराशायी
बह गए पल भर में ...

रहा देखता तू बस
अपना ही घर बचाता ?
अब तुझे कौन जानेगा
कौन मानेगा ...?

लेकिन
प्रश्न है तो उत्तर भी तो है
ईश्वर
जो मंदिर में कम
 हृदय में अधिक बसता है ...

हृदय में भी उसे कहाँ
सुकून है लेकिन
पड़ा है एक कोने में
उपेक्षित सा ,
मंदिर की घंटी उसे मधुर कम
कर्कश ही लगती ...

कराह उठती ईश्वर की भी
आत्मा
रुदन कर पड़ता उसका भी
 हृदय ,
पत्थर के घरों में रहता
पाषण से हृदयों  में बसने
वाले का हृदय
नहीं है पाषाण  सा ...

फूट पड़ती है उसके हृदय से
दर्द की धारा
वही बन जाती धरा पर
प्रलय की धारा ...

बच जाना उसके घर का
है एक चेतावनी ,
एक सन्देश सभी को ,
धरा पर एक ही सत्य है
बस
 ईश्वर का नाम ही ...