Thursday, 7 January 2016

कहाँ और कब तक रहोगे तुम छुप कर

ख़ामोशी पसर सी गई
चहुँ ओर 
जैसे सागर किनारे की मिट्टी।

लहरें भी लौट जाती हैं
धीमे से छू कर
बिना कुछ कहे।

सूनापन नहीं है फिर भी
तुम्हारे खामोश रहने पर भी
क्यूंकि

खामोश कहाँ हैं हवाएँ
महकती जो है
तुम्हारे चुपके से आ जाने से।

कहाँ और कब तक रहोगे
तुम छुप कर
जाओगे किस हद तक
मिलूंगी तुम्हें
हर सरहद पर मैं।



Sunday, 29 November 2015

चलो तुम ही मन्नत की दुआ मांगो..

तुम ने मन्नत मांगी है
दूर जाने की मुझ से,
भूल जाने की मुझे।

एक मन्नत मेरी भी है
याद में ,
दिल में सदा
पास रखने की तुमको।

मन्नतें सदा
सच्ची ही होती हैं
क्यूंकि
मांगी जाती है दिल से।

मुश्किल में होगा
मन्नत पूरी करने वाला भी,
किसकी सुने और
न भी क्यों ना सुने।

चलो तुम ही
मन्नत की दुआ मांगो।
मेरी तो बिन मांगे ही
पूरी होती है मन्नतें।








Saturday, 21 November 2015

ਕਿਵੇਂ ਬਣ ਦੀ ਕਹਾਣੀ ਤੇਰੀ ਤੇ ਮੇਰੀ !

ਨਿੱਕੀ - ਨਿੱਕੀ ਗੱਲਾਂ
ਤੇਰੀਆਂ ਤੇ
ਕੁਜ਼ ਮੇਰੀਆਂ ਵੀ।

ਇਹੋ ਨਿੱਕੀ ਗੱਲਾਂ
ਬਣ ਜਾਣੀ ਸੀ
ਕਹਾਣੀਆਂ।

ਕਿਵੇਂ ਬਣ ਦੀ
ਕਹਾਣੀ ਤੇਰੀ ਤੇ ਮੇਰੀ !

ਤੂ ਹੋਰ ਦਿਸ਼ਾ
ਵੱਲ ਚਲ ਪਿਆ ਤੇ
ਮੈਂ ਵੀ
ਮੁੜ ਗਈ ਸੀ
ਹੋਰ ਦਿਸ਼ਾ ਵੱਲੋਂ।


ਫੇਰ ਵੀ ਜਿੰਦਗੀ
ਮੇਰੇ ਲਈ
ਹੋਰ ਕੁਜ਼ ਵੀ ਨਹੀਂ,
ਬਸ ਤੇਰੀ- ਮੇਰੀ ਹੀ
ਕਹਾਣੀ ਹੈ।





Monday, 16 November 2015

चालीस पार की औरतें

चालीस पार की औरतें
जैसे हो
दीमक लगी दीवारें !
चमकदार सा
बाहरी आवरण,
खोखली होती
भीतर से
परत -दर -परत।

जैसे हो
कोई विशाल वृक्ष,
नीड़ बनाते हैं पंछी जिस पर
बनती है
आसरा और सहारा
असंख्य लताओं का
लेकिन
गिर जाये कब चरमरा कर
लगा हो  घुन  जड़ों में।


 जीवन में
 क्या पाया
या
खोया अधिक !
सोचती,
विश्लेषण करती।

बाबुल के घर से
अधिक हो गई
पिया के घर की,
तलाशती है जड़ें
फिर भी,
चालीस पार की औरतें ! 

Tuesday, 10 November 2015

तुम दीप बन जाना...


अँधेरा मेरे
मन का,
अमावस सा।

ना कर  सको
 अगर
चाँद सा उजाला। 
तुम,
दीप बन जाना।

बन कर
दीप
रोशन करना
मेरी आस का पथ।




Friday, 30 October 2015

कहाँ खोजूँ तुम्हें ...

तुम्हें सोचा
तो सोचा,
देखूं एक बार तुम्हें।

लेकिन
जाने कहाँ
छुप गए हो
तुम तो कहीं !

फिर  देखूं तो
कहाँ देखूं ,
कहाँ खोजूँ तुम्हें ।

बिखरा तो है
बेशक़
तुम्हारा वजूद,
यहाँ-वहां।

मूर्त रूप
चाहूँ देखना तुम्हें,
फिर
कहाँ देखूँ !

खोजना जो चाहा
चाँद में तुम्हें।

सोचा मैंने  चाँद को
 तुम भी तो
देखते होंगे।

तुम चाँद में भी नहीं थे
 लेकिन,
क्यूंकि
अमावस की रात सी
तकदीर है मेरी।

Friday, 16 October 2015

मछलियाँ और स्त्रियां...

मछलियाँ और स्त्रियां
कितना साम्य है
दोनों ही में !

मछलियाँ पानी में रहती है
और
पानी भरे रहती है आँखों में
स्त्रियां !

बिन पानी छटपटाती है
मछलियाँ
और
आँखों का पानी पोंछ
मुस्कुराती है स्त्रियां।

जाल में फँसा कर
मार दी जाती है मछलियाँ
और
रीत -रिवाज़,मोह - जाल  में फंस
खुद ही
ख़त्म हो जाती है स्त्रियां।

अथाह-विशाल सागर है
मछलियों का घर
तलाशती है फिर भी
एक कोना कहीं।

स्त्रियों को
बना जग-जननी,
सौंप दिया है सारा संसार,
खोजती है फिर भी
अपनी जगह,अपनी जड़ें।