Sunday, 17 May 2015

जिंदगी जैसे चौसर की बिसात ...

जिंदगी जैसे
चौसर की बिसात !

सभी के
अपने -अपने खाने है
अपनी -अपनी गोटियां है।
इंतज़ार है तो पासों के
गिर के बिखरने का।

पासों के बिखरने तक
अटकी रहती है सांसे।
कौन  जा रहा है आगे
और
कितने  घर आगे बढ़ना है।

पीछे रह ,
हार जाने का भय भी है।
आगे बढ़ने की होड़ में
किसी को पीछे
 धकेल भी  देना है।

हर कदम  पर है
प्रतियोगिता।
भय भी है
जीत के उन्माद में
पलटवार का।

फिर भी !
जिंदगी तो जिंदगी है।
चाहे चौसर की बिसात ही क्यों न हो ,
चलते जाना ही है ,
एक दिन तो मंजिल मिलेगी ही।

( चित्र गूगल से साभार )

Thursday, 7 May 2015

अब चाँद को छूने की हसरत नहीं...

बचपन के
आँगन में
पानी भरी थाली में
चाँद देखना
जैसे आँगन में ही
चाँद उतर आया हो

नन्ही हथेलियों से
चाँद को छूने की चेष्टा में
पानी के हिल जाने से
चाँद का भी हिल जाना
और नन्हे  से  मन का खिल जाना..

खिले मन से
पानी को हथेली से
छपछपाना...

पानी बिखरा या
चाँद थाली से बाहर हुआ
क्या मालूम...!

शायद चाँद ही
क्योंकि
चाँदनी नन्हे गालों पर
खिल उठती...

समय बदला
आँगन भी वहीं है
पानी की थाली में
चाँद भी वही है..

अब चाँद को
छूने की हसरत नहीं
कि बिखर जाने का भय है
अब तो
अंजुरी में भर कर
रखने की तमन्ना है....

Tuesday, 5 May 2015

माँ हो गई है कुछ कमजोर...

जीवन की
सांध्य बेला में
माँ हो गई है
शरीर से कुछ कमजोर
और याददाश्त से भी।

उसे नहीं रहता अब
कुछ भी याद  ,
तभी तो
वह भूल गई 
मेरी सारी गलतियां ,
शरारतें।

माँ को कहाँ
याद रहता है अपने बच्चों की
गलतियाँ।

 लेकिन उसे याद है
मेरी सारी
पसन्द -नापसन्द ,
नहीं भूली वह मेरे लिए
मेरा पसंदीदा खाना पकाना।

समय के साथ
कमज़ोर पड़ी है नज़र
लेकिन
बना देती है स्वेटर अब भी।

हाँ स्वेटर !
जिसे बनाने में कुछ ही दिन
लगाती थी वह ,
अब कुछ साल लग गए।

अनमोल धरोहर सी है
मेरे लिए वह स्वेटर।

माँ कमजोर तो हो गई  है ,
लेकिन अब भी
 मेरे आने की खबर पर
धूप में भी मेरे इंतज़ार में
 खड़ी रहती है दरवाज़े पर ।

मैं भी एक माँ ही हूँ
लेकिन नहीं हूँ
अपनी माँ सी प्यारी -भोली सी
और क्षमाशील।

सोचती हूँ
संसार की कोई भी माँ
नहीं होती है
अपनी माँ से बेहतर।








Thursday, 30 April 2015

स्त्री अडिग ही रही सदैव...

स्त्री
सदैव खड़ी कर दी जाती है
सवालों के कटघरे में

जवाब को उसके
सफाई मान लिया जाता है
तो
खामोशी को उसका
जुर्म...

तीर जैसे सवालों को
सुनती, सहती है वह
अडिग ,
मुस्कराते हुए ...

स्त्री अडिग ही रही
सदैव
लेकिन
असहनीय है धरा के लिए
स्त्री का
यूँ मुस्कुरा कर
सहन करना ।

विदीर्ण हो जाता है
हृदय ,
और डोल जाती है धरती
आ जाता है
भूचाल....!

Thursday, 16 April 2015

प्रेम बस तुम हमेशा ही कायम हो

प्रेम
तुम आशा हो
मन की प्रिया हो
तन-मन को जो बांधे
वो एकता हो।

प्रेम
तुम नील -गगन की
नीलिमा में हो
मन की अपार  शांति में हो।

प्रेम
बस तुम हो
कभी -कभी ही नहीं
हमेशा ही कायम  हो।



Wednesday, 15 April 2015

कांच की चूड़ी सा नाज़ुक तेरा मन है पिया...

 कांच की चूड़ी सा नाज़ुक 
 तेरा मन है पिया ,
सम्भाल के रखूं 
बंद डिबिया में तुझे। 

जरा सी ठिठोली करूँ तो 
ठेस लगे तेरे मन को 
कांच सा तड़क जाये। 

तू क्या जाने 
तेरे तड़कने के डर से 
दिल कितना धड़के मेरा ,
रखूं संभाल -संभाल तुझे। 

 इक हंसी तेरी पिया 
खनका दे मेरा तन मन ,
चमकता -खनकता रहे तू 
मेरी कलाई में। 

जैसे मेरा मन ,वैसा ही तेरा रंग दिखे मुझे। 
सम्भालू  रखूं तुझे डिबिया में 
कांच की चूड़ी सा मन तेरा पिया। 



Sunday, 12 April 2015

नज़रें शक से टटोलती है क्यों फिर..

सरहदों में बँटे देश !
इस पार मैं ,
उस पार भी मैं ही तो हूँ।

उधर के सैनिक मेरे ,
इधर के सैनिक भी मेरे ही हैं।
एक साथ उठते कदम
बंदूक - राइफल सँभालते।

दिलों में छुपा है कही
किसी कोने में दबा प्यार अब भी ,
नज़रें शक से टटोलती है
क्यों फिर।

दरवाज़ा उधर से बंद हुआ ,
दरवाज़ा बंद यहाँ से भी तो किया गया !
रह गई तो बस कंटीली बाड़
बीच ही में
दिलों को बेधती हुई।

बेबस झांकती रही
मेरी नज़र वहां से ,
झांक तो यहाँ से भी रही थी
 मैं बेबस सी।