Wednesday, 21 January 2015

पर्दों के पीछे इंसान जैसा कोई रहता है....

चारदीवारी में
एक बड़ा सा दरवाजा है
एक दरवाजा छोटा सा भी हैं
ताला लगा है लेकिन वहाँ
भीतर की तरफ

चारदीवारी के भीतर
कई खिड़की दरवाजों वाली
इमारत है
कुछ रोशनदान से झरोखे भी हैं
लेकिन  वे
कस कर बंद कर दिए गए हैं...

इस घर जैसी इमारत में
कई कमरे है
कमरों के दरवाजों पर पर्दे है ं

पर्दों के पीछे
इंसान जैसा कोई रहता है

इस इंसान के पास
हृदय जैसी एक चीज भी है
और
इस हृदय को
उड़ान भरने से कोई
ताला , चारदीवारी रोक
सकती  नहीं.....

7 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (23.01.2015) को "हम सब एक हैं" (चर्चा अंक-1867)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. आपने सही कहा है जी . बहुत ही गहरे भाव लिए हुए है .
    मेरे ब्लोग्स पर आपका स्वागत है .
    धन्यवाद.
    विजय

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  3. बहुत बढ़िया प्रस्तुति

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  4. इस हृदय को
    उड़ान भरने से कोई
    ताला , चारदीवारी रोक
    सकती नहीं.....
    बहुत ही अच्छी पंक्तियाँ हैं।

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  5. परदे के पीछे,इंसान जैसा कोई रहता है
    बहुत सुंदर.

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  6. बि‍ल्‍कुल सही...हृदय की उड़ान पर कब लगाया जा सकता है पहरा...

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