Tuesday, 30 December 2014

फिर भी बने रहना तुम ..

एक साल और बीता
अच्छा या बुरा
मालूम नहीं यह मुझे

बस बीता दिया
या बीत गया ,
जैसे मेरी उमर !
 एक बरस
हो गया हो कम ....

गर्मी इस साल भी रही ,
हाँ ! कीर्तिमान नहीं टूटे
कई बरसों की तरह ,
नए आयाम  के साथ कायम रही
तुम्हारी बेरुखी की तरह।

बारिश भी कहाँ थी !
हुई भी तो
बिन मौसम !
बारिश का बहाना नहीं मिला
मुझे।
इस बार भी तकिये ने ही
आँसू झेले ....

और अब सर्दी !
यह भी नए आयाम
स्थापित किये जा रही है।
बर्फ जमाए जा रही है
हड्डियों में
और रिश्ते में तुम्हारे और मेरे।

फिर भी
बने रहना तुम
मौसम की तरह हर बरस
जैसे भी हो
जाने -अनजाने या थोड़े से पहचाने।

 हाँ ! तुम
गर्मी में कभी  सुकून भरा
झोंका बन जाना ,
सर्दी में गर्म लिहाफ़
ओढ़ा जाना।
बारिश में रुलाना मत !
मुझे तुम्हारा इंतज़ार रहेगा
 हर बरस की तरह !