Tuesday, 23 December 2014

एक पाती जाने पहचाने अनजाने के नाम


एक बात जो
तुमसे कही मैंने ,
बन कर अपनी सी।
वह बात तो तुमने भी
सुनी होगी।

या
अनसुनी कर दी…
कभी कुछ
पलट कर जवाब भी नहीं दिया।

बने रहे
बेगाने से , अनजाने से
फिर मैं क्यों कहूँ
तुम जाने -पहचाने हो !

कोई तो परिचय ,
पहचान तुम्हारा भी तो होगा
कि
तुम्हें अपना सा कह सकूँ !