Sunday, 9 February 2014

जहाँ तुम मेरे अपने तो होते हो

सुनो !
कल मैंने तुम्हें
फिर से सपने में देखा
कितने सौम्य
कितने अपने से लगे

चेहरे पर वही चिरपरिचित मुस्कान
जो मैंने देखी  थी
पहली बार
जब तुम मुझसे मिले थे

लेकिन
यह सच तो ना था !
केवल सपना ही था
कि तुम
मुझे देख कर मुस्कुराये

सपने की  दुनिया से बाहर
तुम कहाँ मुस्कुराते हो

फूला  मुख और नाक
टेढ़ी भृकुटियाँ
चेहरे पर परेशानी
और अजनबीपन
कितने पराये से लगते हो

सच क्या है !
समझ से परे है
कि
तुम मेरे अपने सपने वाले हो
कि
सपने के बाहर  के !

इस दुनिया के रतजगे से
सपनो की
दुनिया ही बेहतर है
जहाँ तुम मेरे अपने तो होते हो
अपनेपन से भरपूर ....