Wednesday, 12 February 2014

तुम्हारे ख़त भी मैंने सम्भाले रखे है ...

तुमने कहा
कि
तुम ने अब भी मेरे ख़त
सम्भाले हैं
छुपा कर रखे हैं उन को
एक अलमारी में
किसी अख़बार के नीचे छुपा कर
दबे अरमानो की तरह ...

तुमने कहा और मैं
बिन हवा
बिन पानी
मुरझाई सी लता ,
फिर से हरी हो गई...

जी लिए
बरसों पुराने पल
जो तुम्हारे साथ बिताये थे...

मैं तुम्हें नहीं बता सकी
कि
तुम्हारे ख़त भी
मैंने सम्भाले रखे है
एक पुराने सन्दूक जैसे गुल्लक में ...

गुल्लक में ही रखे
क्यूंकि वहाँ रखने से यादें
जमा होती जाती है
खर्च करते दर सा लगता है ...

जब भी मैं
मुरझाने लगती हूँ
पढ़ लेती हूँ
यादों के गुल्लक से कुछ यादें
और
फिर से हरी हो जाती हूँ
लहलहाती लता सी ...

क्या  तुम भी
मेरे ख़त
पढ़ते हो या
अब भी छिपा कर रखे हैं ...

या रखें है दबा कर
बिन हवा ,
बिन पानी के
अलमारी के किसी अख़बार में
जैसे कोई अरमान
मेरे और तुम्हारे ....