Friday, 8 March 2013

क्यूंकि स्त्री मात्र देह ही तो है.......


स्त्री
मात्र देह के सिवा
कुछ भी नहीं

और पुरुष ...!
एक सोच है
एक विचार है ...

यह सोच
यह विचार
स्त्री को घेरता गया ..

स्त्री , पुरुष को
सोचती-विचारती
उसी की
सोच को सोचती
ओढती , बिछाती .
रंग में रंगती ...!

हर उम्र का एक अलग रंग
एक अलग सोच

जाने कितनी
सदियाँ बीत गयी
सोचते -विचरते ..

स्त्री को
 पता ही ना चला
इस मकड़ -जाल ,
सोच-विचार ने कब उसे
घेर लिया ...

सोच - विचार की
ऊँगली पकड़ने ,
हाथ थामते
कभी काँधे का सहारा
ढूंढते -ढूंढते ,
यह देह ना जाने कब
कंधों पर सवार  हो चल
पड़ती है ...

क्यूंकि
स्त्री मात्र देह ही तो है
और पुरुष ही तो
विचार है
और सोच भी ...