Wednesday, 6 March 2013

यही वादा था तुम्हारा ..


 तेरे शहर में
अजनबी सी खड़ी हूँ 
मैं,  आज 
लिए एक अजनबियत का 
अहसास  

 उन हवाओं में
वो महक  अब न रही
जिन हवाओं की महक 
लिए एक बार फिर चली 
आई हूँ तेरे शहर में 

 कभी तुम्हारे 
साथ गुज़रा करती थी ,
वे गलियां भी अजनबी
सी ही लगी आज मुझे ..

बन अजनबी सी खड़ी हूँ 
उसी दरख्त के नीचे...

ये दरख्त गवाह है हमारे 
प्रेम  का ,
जहाँ हम मिला करते थे 
अक्सर ,
आखिरी बार भी यहीं मिले थे 

तुम्हारा वादा 
हाँ ...!
तुमने तो वादा किया था 
तुम्हारा  प्रेम  कभी कम ना होगा 
चाहे मिले या ना मिल पायें कभी ...

यह दरख्त गवाह है 
अगर किसी दिन भुला दिया 
तुमने , मुझे ..
इसकी पत्तियां पीली पड़ जाएगी 
यही वादा था तुम्हारा ..

देखो आज इसी दरख्त के
नीचे खड़ी हूँ ,
इसकी पीली पत्तियां समेटती .......