Saturday, 9 March 2013

मैं शिव ...

मैं शिव ...!
तुम्हारे हृदय में 
बसने वाला ...
तुम्हारे हृदय के 
हर तार 
हर भाव को समझने वाला ......

रे मानव ...!
तू तो जानता है 
बिना मेरे या 
बिना शिव के ,
तुम्हारी देह मात्र 
शव ही तो है ...!

मैं उलझ जाता हूँ 
जब तू  चला आता है 
अपने अंतःकरण में 
लिए उलझनों का 
अम्बार ...

तब 
शीतल जल और दुग्ध 
नहीं कर पाते मुझे शीतल 
शांत ही मन जब ना हो 
तुम्हारा ...

मन शांत भी कैसे हो तुम्हारा 
मन बैठे मुझी को तुम 
करते को रखने से इंकार ,
बसाये रखते हो 
उलझनों का अम्बार ...

एक बार तू 
मुझसे बतिया कर 
मुझी से कह अपने मन 
की बात ..
मैं हर लूँगा तुम्हारा हर 
दुःख -संताप ...

रे मानव ...!
तुम्हारे इस संकीर्ण हृदय में 
केवल शिव ही
 बस सकता है  या फिर 
मायावी उलझने ...

शिव है तो तू है 
नहीं तो तू शव के 
सामान ही है ...
.