Friday, 23 August 2013

मुहब्बत कभी एक तरफा नहीं होती

कहीं पढ़ा था कभी
किसी  ने कहा था कहीं ,
ना जाने किसी के लिए
या खुद को  समझाने के लिए ही
लिखा था उसने
ना जाने किसी के लिए ,

लिखा था उसने
मुहब्बत कभी एक तरफा
 नहीं होती
तो मैंने भी यही  जाना
हाँ !
मुहब्बत एक तरफा तो नहीं होती
कभी  लेकिन
 तुमने भी  यही जाना है  क्या !

यह मुहब्बत  तो दोनों
 तरफ ही होती है
एक मन से  पुकार लगाता है तो
दूजा बैचेन
 किसलिए हो उठता है
क्या तुमने भी यही जाना है कभी  !

----उपासना सियाग