Wednesday, 21 August 2013

नहीं जानती मैं यह सच है या भ्रम

अक्सर
कुछ आहटें
एक  पदचाप सी
पीछा करती है मेरा

एक साया सा
रहता है मेरे साथ
लिपटी रहती है एक महक
एक नम स्पर्श की

 नहीं जानती मैं
यह सच है या भ्रम
लेकिन
यह मुझे यकीन तो है
कुछ आहटें मेरे पीछे चला
करती है

ये आहटें जानी पहचानी सी ,
होती है कुछ अपनी सी
लेकिन
साहस नहीं होता
मुड़ कर देखने का
भय आता है
भ्रम टूटने का

नहीं देख सकती मुड़ कर
जीती रहती हूँ
बस इसी भ्रम में कि
ये आहटें मेरी जानी पहचानी है
नहीं मालूम मुझे
सच में जानी पहचानी भी है या
भ्रम ही  है मेरा