Wednesday, 21 August 2013

नहीं जानती मैं यह सच है या भ्रम

अक्सर
कुछ आहटें
एक  पदचाप सी
पीछा करती है मेरा

एक साया सा
रहता है मेरे साथ
लिपटी रहती है एक महक
एक नम स्पर्श की

 नहीं जानती मैं
यह सच है या भ्रम
लेकिन
यह मुझे यकीन तो है
कुछ आहटें मेरे पीछे चला
करती है

ये आहटें जानी पहचानी सी ,
होती है कुछ अपनी सी
लेकिन
साहस नहीं होता
मुड़ कर देखने का
भय आता है
भ्रम टूटने का

नहीं देख सकती मुड़ कर
जीती रहती हूँ
बस इसी भ्रम में कि
ये आहटें मेरी जानी पहचानी है
नहीं मालूम मुझे
सच में जानी पहचानी भी है या
भ्रम ही  है मेरा


9 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज वृहस्पतिवार (22-06-2013) के "संक्षिप्त चर्चा - श्राप काव्य चोरों को" (चर्चा मंचः अंक-1345)
    पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर आदरेया-

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  3. बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

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  4. कभी कभी हम जानबूझकर भ्रम तोड़ना नहीं चाहते
    बहुत सुन्दर रचना
    साभार !

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  5. बात मिलने-मिलाने की मत छेडिये, अब छोडिये
    हम खुश है ख्वाबो-ख़्वाब में यह भ्रम न तोडिये |

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  6. बहुत बढिया...सुन्दर ..

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  7. बहुत सुन्दर

    नहीं ये भ्रम नहीं !
    ये वास्तविकता है।
    मैं और मेरी परछाई
    अक्सर बातें करते हैं,
    मेरी तन्हाई का
    सबसे बड़ा साथी है।
    मैं और मेरी परछाई……

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