Saturday, 10 August 2013

मायके से विदाई की बेला


मायके से विदाई की बेला 
 मन और आँखों
 का एक साथ भरना , 
एक -एक करके बिखरा सामान
 सहेजना ...

बिखरे सामान को सहेजते हुए
 हर जगह- हर एक कोने में 
अपना एक वजूद भी 
नज़र आया,
 जो बरसों उस घर में जिया था ...
कुछ खिलौने ,
कुछ पेन -पेंसिलें ,
कुछ डायरियां 
और वो दुपट्टा भी 
जो माँ ने पहली बार
 सँभालने को दिया था ...

 माँ की कुछ  नसीहते 
तो  पापा की
 सख्त हिदायतें भी
नजर आयी  …. 

टांड पर उचक कर देखा
 तो एक ऊन का छोटा सा गोला
 लुढक आया 
साथ में दो सींख से बनी
 सिलाइयां भी ,
जिस पर कुछ बुना  हुआ था
 एक नन्हा ख्वाब जैसा ,
उलटे पर उलटा और
 सीधे पर सीधा...

अब तो जिन्दगी की 
उधेड़-बुन में 
उलटे पर सीधा और 
सीधे पर उल्टा ही 
बुना जाता है ...

कुछ देर बिखरे 
वजूद को समेटने की
 कोशिश में ऐसे ही खड़ी रही 
 पर  कुछ भी समेट ना सकी 
दो बूंदें  आँखों से ढलक पड़ी ...