Sunday, 27 January 2013

यह पत्थर- पाषाण सी दुनिया........


यह पत्थर- पाषाण सी
दुनिया
पत्थर की दीवारें-मकान
यहाँ लोग क्यूँ -कर ना हो
पत्थर -दिल ....

कौन है मेरा
यहाँ  किसे कहूँ मैं अपना

लहूलुहान हृदय  मेरा
टकरा-टकरा इन पत्थरों से ...
रोता है
टकराता है
चूर - चूर  नहीं होता
ना जाने क्यूँ .....

टकराकर पत्थरों -पाषाण हृदयों से
सबल-मज़बूत होता जाता
मेरा हृदय
मजबूर नहीं होता
न जाने क्यूँ .......

जानता है हृदय मेरा
तराशे जाएँगे ये पत्थर-पाषाण हृदय
एक दिन
एक मूरत में .....

नहीं होता
मूरत का हृदय , पाषाण सा
एक सोता बहता वहां भी
प्रेम का .........