Friday, 25 January 2013

सरहद पर जब भी ........

सरहद पर जब भी 
युद्ध का बिगुल बजता है 
मेरे हाथ प्रार्थना के लिए 
जुड़ जाते हैं 
दुआ के लिए भी उठ जाते हैं 
सीने पर क्रोस भी बनाने
लग जाती हूँ ......

मेरे मन में बस होती है
एक ही बात
सलामत रहे मेरा अपना
जो सरहद पर गया है ,
लौट आये वह फिर से
यही दुआ होती है मेरे मन में ....
मैं कौन हूँ उसकी ...!
कोई भी हो सकती हूँ
एक माँ
बहन ,पत्नी
या बेटी
'उसकी' जो सरहद पर गया है ......
इससे भी क्या फर्क पड़ता है
मैं कहाँ रहती हूँ
सरहद के इस पार हूँ या
उस पार ......
दर्द तो एक जैसा ही है मेरा
भावना भी एक जैसी ही है .......
हूँ तो एक औरत ही न ...!