Tuesday, 1 January 2013

एक आस

कई साल
न जाने कितने साल ,
ना कोई ख़त आया तुम्हारा
ना उम्मीद ही टूटी मेरी ...

हवा सी एक लहराई
पुर्जा उड़ मेरे हाथ आया
तुम्हारा लिखा ख़त
यह तुम्हारा ही ख़त है जो
मेरे हाथ आया ......

एक आस , एक उम्मीद
मुझसे मिलने की
लिख डाली तुमने
नए साल में शायद एक बार
तो मिल जाओगी
जान कर ना सही
अचानक ही ...

तुम्हारी लेखनी क्या है
जैसे सामने ही बैठे बतिया रहे हो
कह रहे हो
जब सामने आऊँ तो नजर न
चुराना
नज़रों से नज़रे मिला कर
मुस्कुरा देना .....

मैं सोचती
पुर्जे को लबों से छुआ कर
नज़रों के सामने तुम होंगे तो
मुस्कुरा कहाँ पाऊँगी
ये नयन तो भर ही जायेंगे
तुम्हे सामने पा कर ....

हवा फिर लहराई
पुर्जा भी थोडा लहराया
देख ,नयन फिर भर आये
उस पर कुछ भी ना था
कोरा था मेरी आस
मेरी उम्मीद की तरह .........