Saturday, 6 October 2012

मन तो मन ही है ......


मन तो मन ही है 
ना जाने कब ,
किस जहाँ की ओर उड़ चले ....
लेकिन ,
जब - जब मन ने उड़ान 
भर कर 
घर की देहरी पार करनी चाही
तो ना जाने कितने रेशमी 
तार क़दमों में आ कर 
उलझा दिए गए ,
इन रेशमी तारों की उलझन
 सुलझाने 
और गाँठ  लगने से बचाने में ही 
जीवन कट गया ,
भले ही कभी उंगलिया लहू -लुहान 
ही क्यूँ ना हो गयी हो ...
लेकिन , 
फिर भी , 
इस मन ने उड़ान भरनी तो नहीं 
छोड़ी ,
आज ये मन एक बार फिर 
चाँद को छूने को चल 
पड़ा है ....
देखें अब कौन रोकता है मन को 
उड़ान भरने से .....